हुआ अंधेरा, 

अब न रौशन फिर से यूंही आंगन होगा।

ढले है बदरा,

गरज बरसता अब न कोई सावन होगा।

रौशनदान में सूर्य की आखरी किरण का भी निशान गया

ये दिन निकला, ये साल गया।


रात है आयी,

मगर न लेकिन रहा है अब अंधेरे का डर।

दिन का प्राणी,

कैसे यूंही बन सकता है निशाचर?

न खेली बाज़ी तो फिर कैसे सब कुछ हार गया

ये दिन निकला, ये साल गया।


सुबह तो होगी,

ये अंधेरा भी तब छंट जाएगा।

शरुआत नई

करने को पर अब न मन बन पाएगा।

आशाओ का बोझ ढोना इतनी दूर बेकार गया

ये दिन निकला, ये साल गया।
___________

Instagram: @anuragcharan

Today was last day of semester and the end of another academic year. So I decided to write something relevant.

Advertisements